Rishabhdev Temple Dhulev (Kesariyaji/Kesariyanathji) धूलेव का ऋषभदेव मंदिर उदयपुर से 64 कि.मी. दूर स्थित एक प्राचीन आस्था स्थल है। यहाँ भगवान ऋषभदेव की श्यामवर्णी प्रतिमा है जिसे ‘केसरियाजी’, ‘केसरियानाथजी’ और स्थानीय भील समाज ‘कालाजी’ के रूप में पूजता है। दिगम्बर, श्वेताम्बर, वैष्णव, शैव और भील समुदाय यहाँ पूर्ण श्रद्धा के साथ पूजा-अर्चना करते हैं। चैत्र कृष्ण अष्टमी पर लगने वाला विशाल मेला इसकी विशेष पहचान है।
Page Contents
Toggleपरिचय | Introduction
उदयपुर से 64 किमी दूरी
कोयल नदी के किनारे धूलेव कस्बा
आज कस्बा ऋषभदेव नाम से प्रसिद्ध
प्रथम तीर्थंकर भगवान ऋषभदेव का मंदिर
बहु-धार्मिक आस्था केंद्र
इतिहास | History
प्राचीन काल से पूजा स्थल
प्रतिमा – श्यामवर्णी, 3 फीट, पद्मासन मुद्रा
चमकीला काला पत्थर
“धूलेव के धणी” – स्थानीय नाम
मंदिर का दूसरा नाम – केसरियाजी / केसरियानाथजी
वास्तुकला | Architecture
मुख्य आकर्षण: केसर का प्रयोग
पूजा-अर्चना में केसर अनिवार्य
मंदिर परिसर में केसर की सुगंध
भव्य प्राचीन शैली
आभा और रंग में केसर प्रधान
धार्मिक महत्व | Religious Significance
जैन दृष्टिकोण
प्रथम तीर्थंकर भगवान ऋषभदेव
जैन समाज का प्रमुख तीर्थ
वैष्णव दृष्टिकोण
भगवान विष्णु का अवतार मान्यता
वैष्णव समुदाय की पूजा परंपरा
भील दृष्टिकोण
भगवान को ‘कालाजी’ नाम से पुकारते
“कालाजी की आण” सर्वोपरि
आदिवासी समाज की विशेष श्रद्धा
मेला एवं उत्सव | Fairs & Festivals
चैत्र कृष्ण अष्टमी को विशाल मेला
हजारों श्रद्धालुओं की भागीदारी
केसर चढ़ाने की परंपरा
सांस्कृतिक व धार्मिक महत्व
सारांश | Summary
धूलेव का ऋषभदेव मंदिर, जिसे केसरियाजी या केसरियानाथजी भी कहा जाता है, उदयपुर से 64 किलोमीटर दूर कोयल नदी के किनारे स्थित एक अत्यंत प्राचीन और पवित्र तीर्थ है। यह मंदिर केवल जैन श्रद्धालुओं तक सीमित नहीं है, बल्कि दिगम्बर, श्वेताम्बर, वैष्णव, शैव और भील समुदाय सभी इसे अपने-अपने दृष्टिकोण से पूजते हैं। भगवान ऋषभदेव की श्यामवर्णी तीन फीट ऊँची प्रतिमा, जो चमकीले काले पत्थर से निर्मित है, पद्मासन मुद्रा में स्थापित है। इस प्रतिमा की विशेषता है कि यहाँ पूजा-अर्चना में केसर (Saffron) का विशेष प्रयोग किया जाता है, जिससे पूरा मंदिर सदैव केसर की सुगंध और आभा से मंडित रहता है। स्थानीय आदिवासी भील समाज भगवान को ‘कालाजी’ नाम से पुकारता है और “कालाजी की आण” को सर्वोच्च मानता है। वहीं, वैष्णव समुदाय उन्हें विष्णु का अवतार मानकर श्रद्धा अर्पित करता है। प्रतिवर्ष चैत्र कृष्ण अष्टमी को यहाँ विशाल मेला लगता है जिसमें हजारों श्रद्धालु सम्मिलित होते हैं। इस प्रकार, धूलेव का ऋषभदेव मंदिर बहु-धार्मिक एकता और आस्था का अद्भुत प्रतीक है।
रोचक तथ्य तालिका | Interesting Facts Table
तथ्य |
विवरण |
| स्थान | उदयपुर से 64 किमी, कोयल नदी तट |
| प्रतिमा | 3 फीट ऊँची, श्यामवर्णी, पद्मासन |
| पूजा सामग्री | केसर (मुख्य प्रयोग) |
| स्थानीय नाम | कालाजी, धूलेव के धणी |
| वार्षिक मेला | चैत्र कृष्ण अष्टमी |
FAQs
Q1. धूलेव का ऋषभदेव मंदिर कहाँ स्थित है?
A1. यह उदयपुर से लगभग 64 किमी दूर कोयल नदी के किनारे धूलेव कस्बे में स्थित है।
Q2. इस मंदिर का दूसरा नाम क्या है?
A2. इसे केसरियाजी या केसरियानाथजी भी कहा जाता है।
Q3. भगवान ऋषभदेव की प्रतिमा कैसी है?
A3. यह श्यामवर्णी, तीन फीट ऊँची, पद्मासन मुद्रा में, चमकीले काले पत्थर से बनी है।
Q4. इस मंदिर में पूजा किस विशेष सामग्री से होती है?
A4. यहाँ पूजा-अर्चना मुख्यतः केसर (Saffron) से की जाती है।
Q5. स्थानीय भील समाज भगवान को क्या कहते हैं?
A5. भील समाज उन्हें ‘कालाजी’ कहकर पुकारता है।
Q6. वैष्णव समुदाय भगवान ऋषभदेव को किस रूप में मानता है?
A6. वैष्णव समुदाय उन्हें भगवान विष्णु का अवतार मानता है।
Q7. मंदिर में सबसे बड़ा आयोजन कब होता है?
A7. चैत्र कृष्ण अष्टमी पर यहाँ विशाल मेला आयोजित होता है।
Q8. धूलेव कस्बे को आजकल किस नाम से जाना जाता है?
A8. आजकल धूलेव कस्बा ‘ऋषभदेव’ नाम से ही प्रसिद्ध है।
Q9. इस मंदिर का महत्व किस कारण से विशेष है?
A9. यह मंदिर जैन, वैष्णव, शैव और भील सभी समुदायों का साझा आस्था स्थल है।
Q10. मंदिर की सुगंध और आभा किससे मंडित रहती है?
A10. यहाँ हर ओर केसर की सुगंध और आभा फैली रहती है।
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