Noh Excavation (नोह उत्खनन) – भरतपुर का लौह युगीन सभ्यता स्थल

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Noh Excavation नोह उत्खनन भरतपुर का प्रसिद्ध लौह युगीन स्थल है, जहाँ 1100 ई.पू. से 900 ई.पू. के अवशेष मिले। यहाँ लोहे के प्रयोग और ब्राह्मी लेख के प्रमाण मिले हैं।

1. Introduction (परिचय)

नोह, राजस्थान के भरतपुर जिले में स्थित एक प्राचीन स्थल है।

यहाँ की खुदाई 1963-64 ई. में श्री रतनचन्द्र अग्रवाल के निर्देशन में की गई।

यह स्थल भारतीय उपमहाद्वीप में लौह युगीन संस्कृति के प्रारंभिक प्रमाण प्रस्तुत करता है।

2. Excavation Details (उत्खनन का विवरण)

1. उत्खनन कार्य 1963-64 में हुआ।

2. निदेशक: श्री रतनचन्द्र अग्रवाल।

3. रेडियो कार्बन परीक्षण के अनुसार, सभ्यता की अवधि 1100 ई.पू. – 900 ई.पू. के बीच रही।

4. यहाँ पाँच सांस्कृतिक युगों के अवशेष मिले हैं।

3. Archaeological Findings (पुरातात्त्विक खोजें)

विशाल यक्ष प्रतिमा: प्रस्तर की बनी यक्ष मूर्ति नोह की प्रमुख खोजों में से है।

मौर्यकालीन पॉलिश: चुनार पत्थर के चिकने टुकड़ों पर पॉलिश मिलने से मौर्यकालीन प्रभाव का संकेत मिलता है।

ब्राह्मी लेख: एक पात्र पर ब्राह्मी लिपि में चारों ओर लेख अंकित मिला।

लोहे का प्रयोग: प्रमाण मिलता है कि भारत में 12वीं सदी ई.पू. में लोहा ज्ञात था।

रिंगवेल्स (Ring Wells): एक ही स्थान से 16 रिंगवेल्स प्राप्त हुए।

4. Cultural Phases (सांस्कृतिक युग)

1. पहला युग: नवपाषाण काल के अवशेष।

2. दूसरा युग: ताम्रपाषाण तत्व।

3. तीसरा युग: लौह युगीन संस्कृति (मुख्य काल)।

4. चौथा युग: उत्तर वैदिक काल।

5. पाँचवाँ युग: प्रारंभिक ऐतिहासिक काल।

5. Importance of Noh (नोह का महत्व)

नोह भारत के प्राचीन लौह युगीन सभ्यता का महत्वपूर्ण केंद्र रहा।

यहाँ से प्राप्त सामग्री से यह सिद्ध होता है कि भारत में लौह धातु का प्रयोग ईसा पूर्व 12वीं सदी में ही प्रारंभ हो गया था।

यहाँ की ब्लैक एंड रेड वेयर (Black and Red Ware) मृद्भाण्ड परंपरा इसे अन्य स्थलों जैसे आहड़ और गणेश्वर से जोड़ती है।

नोह का उत्खनन भारतीय इतिहास में धातु युग की उत्पत्ति समझने में एक महत्वपूर्ण अध्याय जोड़ता है।

सारांश (Summary )

नोह (भरतपुर) का उत्खनन राजस्थान के पुरातात्त्विक इतिहास में एक मील का पत्थर माना जाता है। 1963-64 में रतनचन्द्र अग्रवाल के निर्देशन में हुई खुदाई ने लौह युगीन सभ्यता के स्पष्ट प्रमाण दिए। रेडियोकार्बन परीक्षण से यह सभ्यता 1100 ई.पू. से 900 ई.पू. के बीच की मानी गई। यहाँ से मिली विशालकाय यक्ष प्रतिमा, ब्राह्मी लिपि वाले पात्र, और मौर्यकालीन पॉलिश वाले चुनार पत्थर इस स्थल की प्राचीनता को दर्शाते हैं। सबसे महत्वपूर्ण खोज यह रही कि यहाँ के अवशेषों से यह प्रमाणित होता है कि भारतवर्ष में लौह धातु का प्रयोग ईसा पूर्व 12वीं सदी में ही ज्ञात था। यहाँ की ब्लैक एवं रेड वेयर मृद्भाण्ड परंपरा इसे आहड़ और गणेश्वर जैसी सभ्यताओं से जोड़ती है। नोह के उत्खनन से यह स्पष्ट हुआ कि भरतपुर क्षेत्र प्राचीन भारत में एक सक्रिय लौह उत्पादन और सांस्कृतिक केंद्र रहा होगा।

Facts Table (तथ्य तालिका)

तथ्य

 विवरण

उत्खनन वर्ष  1963-64 ई.
उत्खनन निदेशक उत्खनन निदेशक
सभ्यता काल  1100 ई.पू. – 900 ई.पू.
प्रमुख खोजें  यक्ष प्रतिमा, ब्राह्मी लेख, रिंगवेल्स
विशेषता  लौह युगीन सभ्यता के प्रारंभिक प्रमाण

FAQs (अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न)

1. नोह कहाँ स्थित है?

भरतपुर जिले में।

2. नोह की खुदाई कब हुई?

1963-64 ई. में।

3. खुदाई का निर्देशन किसने किया?

श्री रतनचन्द्र अग्रवाल ने।

4. नोह सभ्यता का काल कब का है?

1100 ई.पू. से 900 ई.पू.।

5. यहाँ कौन-कौन से अवशेष मिले?

यक्ष प्रतिमा, रिंगवेल्स, ब्राह्मी लेख।

6. यहाँ किस धातु के प्रयोग के प्रमाण मिले?

लोहा।

7. कुल कितने रिंगवेल्स मिले?

16।

8. यहाँ की मिट्टी के बर्तनों की विशेषता क्या है?

ब्लैक एंड रेड वेयर परंपरा।

9. नोह स्थल को किस युग से जोड़ा जाता है?

लौह युग से।

10. नोह की खोज से क्या सिद्ध हुआ?

भारत में लौह धातु का प्रयोग ईसा पूर्व 12वीं सदी में ज्ञात था।

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