Raidh Tonk – रैढ़, टोंक : प्राचीन राजस्थान का टाटानगर और औद्योगिक धरोहर

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Raidh Tonk रैढ़ टोंक राजस्थान का एक प्रसिद्ध पुरातात्विक स्थल है, जहाँ धातु उद्योग, मृद्भाण्ड, मूर्तियाँ और सिक्के मिले हैं। इसे प्राचीन राजस्थान का ‘टाटानगर’ कहा जाता है।

1. Introduction (परिचय)

रैढ़, राजस्थान के टोंक जिले में ढील नदी के किनारे स्थित एक प्राचीन औद्योगिक नगर था।

इसे “प्राचीन राजस्थान का टाटानगर” कहा गया है, क्योंकि यहाँ लौह उपकरणों का निर्माण बड़े पैमाने पर होता था।

यह स्थल राजस्थान के औद्योगिक और सांस्कृतिक इतिहास को उजागर करता है।

2. Excavation History (उत्खनन का इतिहास)

1. रैढ़ की खुदाई का कार्य 1938 से 1940 के बीच किया गया।

2. प्रारंभिक खुदाई बहादुर दयाराम साहनी (Director, Archaeological & Historical Research, Jaipur) द्वारा की गई।

3. इसे अंतिम रूप डॉ. केदारनाथ पुरी ने दिया।

4. पूरी रिपोर्ट “Excavation at Raidh” नाम से जयपुर शासन द्वारा प्रकाशित हुई।

3. Urban Structure (नगरीय संरचना)

खुदाई में आलीशान इमारतों, फुटपाथों, नालियों और द्विमंजिला मकानों के अवशेष मिले हैं।

इन अवशेषों से यह क्षेत्र एक समृद्ध नगर रहा है।

लगभग 115 गोल ‘रिंग वेल्स’ (Ring Wells) मिले हैं, जिनका प्रयोग जल निकासी हेतु किया जाता था।

4. Pottery and Artifacts (मृद्भाण्ड और कलात्मक वस्तुएँ)

यहाँ के सभी मृद्भाण्ड चक्र से निर्मित हैं, हाथ से बने केवल एक छोटे कप का उदाहरण मिला है।

इन बर्तनों की परंपरा 500 ई.पू. से 200 ई. तक की मानी जाती है।

एक संकीर्ण गर्दन वाला गुलाबी फूलदान यहाँ की श्रेष्ठतम वस्तु है।

खिलौनों में बंदर के रूप में मिट्टी की वाहिकाएँ मिली हैं।

एक यक्षणी प्रतिमा मिली है, जो शुंग काल (द्वितीय सदी ई.पू.) की मानी जाती है।

5. Industrial Significance (औद्योगिक महत्व)

रैढ़ में लौह उपकरणों की बड़ी मात्रा मिली है, जैसे:

तलवारें

चाकू, हंसिया, भाले

दरवाजों की फिटिंग

चाबियाँ और श्रृंखलाएँ

यह क्षेत्र धातु निर्माण और निर्यात केंद्र के रूप में प्रसिद्ध था।

इसी कारण इसे “Ancient Tata Nagar of Rajasthan” कहा गया।

6. Coins and Currency (सिक्के और मुद्रा)

यहाँ कुल 3075 आहत मुद्राएँ (Punch-marked coins) मिली हैं।

इनमें शामिल हैं:

300 मालव जनपद के सिक्के

14 मित्र सिक्के

6 सेनापति सिक्के

7 वपु सिक्के

1 अपोलोडोट्स (Greek ruler) का सिक्का

189 अज्ञात ताम्र सिक्के

यह विविधता सांस्कृतिक और व्यापारिक सम्पर्कों को दर्शाती है।

7. Cultural Importance (सांस्कृतिक महत्व)

रैढ़ का इतिहास शुंग कालीन कला और उद्योग से जुड़ा है।

यक्षणी प्रतिमा इसकी कलात्मक परंपरा का सर्वोत्तम उदाहरण है।

यहाँ के लोग बुनाई और कपड़ा निर्माण में भी निपुण थे, जैसा कि भारतीय केंद्रीय रुई समिति (बंबई) की रिपोर्ट से सिद्ध है।

8. सारांश (Summary)

रैढ़, टोंक राजस्थान के उन दुर्लभ पुरातात्विक स्थलों में से एक है जिसने भारत के औद्योगिक इतिहास में अपनी विशिष्ट पहचान बनाई है। 1938 से 1940 के बीच बहादुर दयाराम साहनी और डॉ. केदारनाथ पुरी द्वारा की गई खुदाई में यहाँ के समृद्ध नगर के प्रमाण मिले। समानांतर दीवारें, नालियाँ, रिंग वेल्स और द्विमंजिला मकान यह बताते हैं कि यह क्षेत्र उन्नत शहरी संस्कृति से संपन्न था। यहाँ के मृद्भाण्ड, मिट्टी की मूर्तियाँ और यक्षणी प्रतिमा शुंग कालीन कला और शिल्प का उत्कृष्ट उदाहरण हैं। बड़ी मात्रा में मिले लौह उपकरणों, हथियारों और सिक्कों ने यह सिद्ध किया कि रैढ़ एक औद्योगिक और व्यापारिक केंद्र था, जहाँ उत्पादन और निर्यात दोनों ही स्तरों पर गतिविधियाँ चलती थीं। इसीलिए इसे “प्राचीन राजस्थान का टाटानगर” कहा गया। रैढ़ का अध्ययन न केवल राजस्थान के औद्योगिक अतीत को बल्कि भारत के सांस्कृतिक विकास को भी नई दृष्टि से उजागर करता है।

9. Facts Table (तथ्य तालिका)

तथ्य

 विवरण

नदी ढील नदी
 खुदाई  अवधि 1938–1940
खुदाईकर्ता बहादुर दयाराम साहनी, डॉ. केदारनाथ पुरी
प्रमुख अवशेष  लौह उपकरण, यक्षणी मूर्ति, रिंग वेल्स, सिक्के

10. FAQs (अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न)

1. रैढ़ कहाँ स्थित है?

टोंक, राजस्थान में।

2. रैढ़ की खुदाई कब हुई थी?

1938 से 1940 के बीच।

3. रैढ़ की खुदाई किसने की थी?

बहादुर दयाराम साहनी और डॉ. केदारनाथ पुरी ने।

4. रैढ़ को क्या कहा जाता है?

प्राचीन राजस्थान का टाटानगर।

5. यहाँ कौन-कौन से औजार मिले हैं?

तलवारें, भाले, चाकू, कुल्हाड़ी, चाबियाँ।

6. रैढ़ का प्रमुख उद्योग क्या था?

लौह धातु उद्योग।

7. यहाँ से कितने पंचमार्क सिक्के मिले हैं?

लगभग 3075।

8. रैढ़ की यक्षणी प्रतिमा किस काल की है?

शुंग काल की (द्वितीय सदी ई.पू.)।

9. यहाँ कौन सी नदी बहती है?

ढील नदी।

10. रैढ़ की खास पहचान क्या है?

औद्योगिक नगर और लौह निर्माण केंद्र।

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