ताम्रयुगीन स्थल (Other Chalcolithic Sites of Rajasthan) – राजस्थान की ताम्र संस्कृति का गौरवशाली इतिहास

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ताम्रयुगीन स्थल राजस्थान के प्राचीन सभ्यता केंद्र हैं, जहाँ से ताम्र उपकरण, मृद्भांड और आभूषण मिले हैं। ये स्थल प्राचीन भारत और पश्चिम एशिया के सांस्कृतिक संबंधों का प्रमाण हैं।


1. परिचय (Introduction – ताम्रयुगीन राजस्थान का परिचय)

राजस्थान के ताम्रयुगीन स्थल भारत की प्राचीन सभ्यता और धातु संस्कृति के प्रतीक हैं।

इन स्थलों से प्राप्त सामग्री मानव सभ्यता के संक्रमण काल (2500–1200 ई.पू.) की झलक देती है।

यह काल पत्थर युग से धातु युग में परिवर्तन का युग माना जाता है।

2. प्रमुख ताम्रयुगीन स्थल (Main Chalcolithic Sites – राजस्थान के स्थल)

राजस्थान के प्रमुख ताम्रयुगीन स्थल निम्न हैं:

1. पिण्डपाड़लिया – जिला चित्तौड़गढ़

2. झाड़ोल – जिला उदयपुर

3. कुराड़ा – जिला नागौर

4. साबणिया – जिला बीकानेर

5. नन्दलालपुरा – जिला जयपुर

6. किराडोत – जिला जयपुर

7. एलाना – जिला जालौर

8. बूढ़ा पुष्कर – जिला अजमेर

9. कोल माहोली – जिला सवाई माधोपुर

10. मलाह – जिला भरतपुर

11. चीथवाड़ी – जिला जयपुर

12. जोधपुरा – जिला जयपुर (साबी नदी के किनारे)

13. नोह – जिला भरतपुर

3. प्रमुख खोजें (Major Discoveries – मुख्य पुरा सामग्री)

कुराड़ा (नागौर):

उत्खनन सन् 1934 में हुआ।

ताम्र उपकरणों का विशाल भंडार प्राप्त हुआ।

यहाँ से मिला प्रणालयुक्त अर्ध्यपात्र राजस्थान को भारतीय पुरातत्व की विशेष देन है।

यह पश्चिमी एशिया (विशेषतः ईरान) से सांस्कृतिक संबंधों का संकेत देता है।

मलाह (भरतपुर):

यहाँ से ताम्र हारपून और तलवारें प्राप्त हुईं।

हारपून प्रागैतिहासिक काल में बड़े जीवों के शिकार हेतु प्रयुक्त हथियार था।

किराडोत (जयपुर):

यहाँ से 56 ताम्र चूड़ियाँ मिलीं।

यह सिंधु सभ्यता की सांस्कृतिक परंपरा से जुड़ी मानी जाती हैं।

मोहनजोदड़ो की नग्न नृत्यांगना मूर्ति में भी इसी प्रकार की चूड़ियाँ दर्शित हैं।

4. सांस्कृतिक महत्व (Cultural Significance – सांस्कृतिक दृष्टि से महत्व)

1. राजस्थान के ये स्थल ताम्र उपकरणों और औजारों की तकनीकी प्रगति को दर्शाते हैं।

2. कला, आभूषण और व्यापारिक आदान-प्रदान के साक्ष्य यहाँ से प्राप्त हुए हैं।

3. पश्चिमी एशिया से संपर्क के प्रमाण मिलते हैं, जिससे यह सांस्कृतिक सेतु क्षेत्र बनता है।

4. इन स्थलों ने भारत की धातु युगीन सभ्यता की नींव रखी।

5. नोह और जोधपुरा के उत्खनन (Excavations of Noh & Jodhpura – विशेष खोजें)

जोधपुरा (जयपुर):

साबी नदी के किनारे स्थित।

उत्खनन रत्नचन्द्र अग्रवाल व विजय कुमार के निर्देशन में हुआ।

यहाँ से कपिषवर्णी मृद्भांड (brownish pottery) की 1.5 मीटर मोटी परत मिली।

नोह (भरतपुर):

नोह में भी इसी प्रकार के कपिषवर्णी मृद्भांड मिले।

यह स्थल दोआब संस्कृति (Interfluve Culture) से संबंधित है।

नोह और जोधपुरा से ताम्र सामग्री नहीं, परंतु काले-लाल मृद्भांड प्राप्त हुए।

काल निर्धारण: लगभग 1200 ई.पू.

6. ऐतिहासिक विश्लेषण (Historical Analysis – ऐतिहासिक दृष्टिकोण)

राजस्थान के ताम्रयुगीन स्थल भारत की तकनीकी और सांस्कृतिक उन्नति का प्रतीक हैं।

यहाँ की मिट्टी की वस्तुएँ, ताम्र उपकरण और आभूषण बताते हैं कि यह क्षेत्र व्यवस्थित समाज और शिल्प परंपरा का केंद्र था।

कुराड़ा और किराडोत जैसे स्थलों से यह स्पष्ट होता है कि सिंधु सभ्यता और राजस्थान की संस्कृति में गहरा संबंध था।

इन स्थलों ने भारत की प्राचीन धातु सभ्यता की उत्पत्ति और विस्तार को समझने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

सारांश (Summary in Hindi – विश्लेषणात्मक विवरण)

राजस्थान के ताम्रयुगीन स्थल भारतीय पुरातत्व के इतिहास में अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान रखते हैं। ये स्थल इस बात का प्रमाण हैं कि भारत में धातु प्रयोग, कलाकारी और सामाजिक संगठन की परंपरा बहुत प्राचीन रही है। कुराड़ा, मलाह, किराडोत, नोह और जोधपुरा जैसे स्थलों ने राजस्थान के सांस्कृतिक वैभव को प्रकट किया। कुराड़ा से प्राप्त प्रणालयुक्त अर्ध्यपात्र पश्चिमी एशिया से सांस्कृतिक संबंधों का संकेत देता है, वहीं किराडोत से मिली चूड़ियाँ सिंधु सभ्यता की परंपरा को पुनः जीवित करती हैं। नोह और जोधपुरा के उत्खनन से कपिषवर्णी मृद्भांडों की प्राप्ति यह दर्शाती है कि यह क्षेत्र दोआब संस्कृति का अंग था। इन स्थलों की खोज ने यह सिद्ध किया कि राजस्थान ताम्रयुगीन सभ्यता का एक प्रमुख केंद्र था, जिसने भारतीय इतिहास को नई दिशा दी।

Facts Table (तथ्य तालिका)

 तथ्य

 विवरण

प्रमुख स्थल  कुराड़ा, मलाह, किराडोत, नोह, जोधपुरा
प्रमुख काल  2500–1200 ई.पू.
 उत्खनन वर्ष कुराड़ा – 1934
प्रमुख खोजें  ताम्र उपकरण, हारपून, तलवारें, मृद्भांड
सांस्कृतिक महत्व   पश्चिम एशिया और सिंधु सभ्यता से संपर्क

FAQs (अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न)

1. ताम्रयुगीन स्थल क्या हैं?

धातु युग की प्रारंभिक सभ्यता से जुड़े पुरास्थल।

2. कुराड़ा स्थल कहाँ स्थित है?

नागौर जिले में।

3. कुराड़ा में क्या मिला?

ताम्र उपकरण और प्रणालयुक्त अर्ध्यपात्र।

4. मलाह स्थल से क्या प्राप्त हुआ?

ताम्र हारपून और तलवारें।

5. किराडोत में क्या मिला?

56 ताम्र चूड़ियाँ।

6. नोह स्थल किस जिले में है?

भरतपुर में।

7. जोधपुरा किस नदी के किनारे है?

साबी नदी के किनारे।

8. कपिषवर्णी मृद्भांड क्या हैं?

भूरे रंग के मिट्टी के बर्तन जो ताम्रयुगीन संस्कृति दर्शाते हैं।

9. इन स्थलों का काल क्या है?

लगभग 2500–1200 ई.पू.।

10. कौन से स्थल दोआब संस्कृति से जुड़े हैं?

नोह और जोधपुरा।

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