दुरसा आढ़ा जीवन परिचय – डिंगल साहित्य के प्रसिद्ध कवि और अकबर के दरबारी कवि। जानिए उनका जन्म, प्रमुख रचनाएँ, उपाधियाँ और राजस्थान साहित्य में योगदान।
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1. परिचय (Introduction)
दुरसा आढ़ा डिंगल साहित्य के ख्यातिनाम कवि और वीर योद्धा थे।
इनका साहित्य राजस्थान की वीरता, संस्कृति और धार्मिक भावना को उजागर करता है।
2. जन्म एवं प्रारंभिक जीवन (Birth & Early Life)
जन्म: वि.सं. 1592
स्थान: मारवाड़ के धूंदला गाँव
पिता: मेहा आढ़ा (बचपन में ही मृत्यु हो गई)।
पालन-पोषण: बगड़ी के ठाकुर प्रतापसिंह ने किया।
3. दरबारी जीवन और सैन्य योगदान (Court Life & Warrior Role)
दुरसा आढ़ा अकबर के दरबारी कवि थे।
साथ ही वे एक साहसी योद्धा भी थे।
अकबर ने इन्हें “लाख पाँव” की उपाधि दी।
4. साहित्यिक योगदान (Literary Contribution)
डिंगल भाषा में रचनाएँ कीं।
उनकी कविताओं में वीरता, भक्ति और लोकजीवन की छवि।
धार्मिक भावना और सामाजिक परंपराओं का चित्रण।
5. प्रमुख रचनाएँ (Major Works)
विरुद छहत्तरी
किरातार बावनी
चाळकनेस माताजी रो छंद
अजाजी री भूचरमोरी री गजगत
मानसिंह जी रा झूलणा
6. सम्मान एवं विशेष तथ्य (Honours & Unique Facts)
आबू के अचलेश्वर मंदिर में नंदी के पास इनकी पीतल की प्रतिमा स्थापित है।
किसी देव मंदिर में मानव प्रतिमा का होना एक अद्वितीय तथ्य है।
7. निधन और स्मृति (Demise & Legacy)
इनके साहित्य और योगदान से डिंगल भाषा का गौरव बढ़ा।
आज भी इन्हें डिंगल काव्य और वीर रस के महान कवि के रूप में याद किया जाता है।
8. निष्कर्ष (Conclusion)
दुरसा आढ़ा केवल कवि ही नहीं बल्कि योद्धा और सांस्कृतिक प्रतीक भी थे। उनकी रचनाएँ राजस्थान की वीरता, धर्म और लोकजीवन को अमर करती हैं।
9. सारांश
दुरसा आढ़ा का जन्म वि.सं. 1592 में मारवाड़ के धूंदला गाँव में हुआ। इनके पिता का नाम मेहा आढ़ा था, जिनका देहांत बचपन में ही हो गया। इनका पालन-पोषण बगड़ी के ठाकुर प्रतापसिंह ने किया। दुरसा आढ़ा डिंगल भाषा के श्रेष्ठ कवियों में गिने जाते हैं। वे केवल कवि ही नहीं बल्कि एक वीर योद्धा भी थे। मुगल सम्राट अकबर के दरबार में वे सम्मानित कवि रहे और अकबर ने उन्हें “लाख पाँव” से विभूषित किया। उनकी प्रमुख रचनाओं में विरुद छहत्तरी, किरतार बावनी, चाळकनेस माताजी रो छंद, अजाजी री भूचरमोरी री गजगत, मानसिंह जी रा झूलणा शामिल हैं। इनके काव्य में वीरता, लोकधर्म, भक्ति और सामाजिक जीवन का सजीव चित्रण मिलता है। सबसे विशेष तथ्य यह है कि आबू के अचलेश्वर मंदिर में नंदी के पास इनकी पीतल की प्रतिमा स्थापित है, जो किसी देवालय में मनुष्य की प्रतिमा होने का अनोखा उदाहरण है। डिंगल साहित्य और वीर रस के प्रति उनका योगदान उन्हें राजस्थान का अमर कवि बनाता है।
10. तथ्य तालिका (Facts Table)
तथ्य |
विवरण |
| जन्म | वि.सं. 1592, धूंदला (मारवाड़) |
| पिता | मेहा आढ़ा |
| दरबार | अकबर के दरबारी कवि |
| उपाधि | लाख पाँव |
| प्रमुख रचनाएँ | विरुद छहत्तरी, किरतार बावनी, मानसिंह जी रा झूलणा |
11. FAQs (प्रश्नोत्तर)
प्रश्न 1: दुरसा आढ़ा का जन्म कब और कहाँ हुआ?
उत्तर: दुरसा आढ़ा का जन्म वि.सं. 1592 में मारवाड़ के धूंदला गाँव में हुआ।
प्रश्न 2: दुरसा आढ़ा के पिता का नाम क्या था?
उत्तर: दुरसा आढ़ा के पिता का नाम मेहा आढ़ा था।
प्रश्न 3: दुरसा आढ़ा का पालन-पोषण किसने किया?
उत्तर: बगड़ी के ठाकुर प्रतापसिंह ने दुरसा आढ़ा का पालन-पोषण किया।
प्रश्न 4: दुरसा आढ़ा किसके दरबारी कवि थे?
उत्तर: वे मुगल सम्राट अकबर के दरबारी कवि थे।
प्रश्न 5: अकबर ने दुरसा आढ़ा को कौन-सी उपाधि दी?
उत्तर: अकबर ने उन्हें “लाख पाँव” की उपाधि दी।
प्रश्न 6: दुरसा आढ़ा की प्रमुख रचनाएँ कौन-सी हैं?
उत्तर: विरुद छहत्तरी, किरतार बावनी, चाळकनेस माताजी रो छंद, अजाजी री भूचरमोरी री गजगत, मानसिंह जी रा झूलणा।
प्रश्न 7: दुरसा आढ़ा की प्रतिमा कहाँ स्थापित है?
उत्तर: आबू के अचलेश्वर मंदिर में नंदी के पास उनकी पीतल की प्रतिमा स्थापित है।
प्रश्न 8: उनकी रचनाओं की विशेषता क्या है?
उत्तर: उनकी रचनाओं में वीरता, भक्ति और सामाजिक जीवन का चित्रण मिलता है।
प्रश्न 9: दुरसा आढ़ा किस भाषा के कवि थे?
उत्तर: वे डिंगल भाषा के कवि थे।
प्रश्न 10: दुरसा आढ़ा को राजस्थान साहित्य में किस रूप में याद किया जाता है?
उत्तर: उन्हें डिंगल काव्य और वीर रस के महान कवि के रूप में याद किया जाता है।
