Saanjhi – साँझी कला: श्रीकृष्ण की आराधना से जनजीवन तक की पारंपरिक लोककला

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Saanjhi – साँझी कला भगवान श्रीकृष्ण द्वारा आरंभ की गई भारतीय लोककला है, जो राजस्थान और वृंदावन की धार्मिक परंपराओं में आज भी जीवित है।


1. Introduction – परिचय

Saanjhi Art भारत की एक प्राचीन लोककला है, जो भगवान श्रीकृष्ण और राधा की लीलाओं से जुड़ी है।

यह कला पितृपक्ष के दौरान विशेष रूप से राजस्थान और वृंदावन में बनाई जाती है।

इसे कुमारी कन्याएँ दीवारों पर गोबर, आटा, हल्दी और कुमकुम से सजाकर बनाती हैं।

2. Origin of Saanjhi Art – साँझी कला की उत्पत्ति

1. परंपरा के अनुसार, भगवान श्रीकृष्ण ने राधाजी को मनाने के लिए फूलों और पत्तों से उनका चित्र बनाया।

2. तभी से साँझी बनाने की परंपरा शुरू हुई।

3. यह परंपरा वृंदावन से नाथद्वारा तक पहुँची, जब श्रीनाथजी के पुजारी इसे साथ लेकर आए।

3. Method of Making – साँझी बनाने की विधि

1. साँझी मुख्यतः दीवार पर गोबर से आकृतियाँ बनाकर तैयार की जाती है।

2. सजावट में आटा, हल्दी, कुमकुम, कौड़ियाँ, फूल-पत्तियाँ आदि का प्रयोग किया जाता है।

3. ग्यारहवें दिन बड़ी साँझी (संझया कोट) बनाई जाती है, जिसे अमावस्या तक सुरक्षित रखा जाता है।

4. केंद्र में देवी की आकृति, चारों ओर भाई, चौपड़, चोर, दर्पण, ढोलक जैसी आकृतियाँ बनाई जाती हैं।

4. Types and Variations – साँझी के प्रकार

संझया कोट (Kot Saanjhi):

यह साँझी का विकसित रूप है।

इसे बड़ी साँझी भी कहा जाता है।

केले की साँझी (Kadali Saanjhi):

नाथद्वारा के श्रीनाथजी मंदिर की यह साँझी केले के पत्तों से बनाई जाती है।

5. Religious and Cultural Significance – धार्मिक और सांस्कृतिक महत्व

साँझी देवी की उपासना और परिवार की मंगलकामना का प्रतीक है।

यह कला स्त्री-शक्ति और भक्ति का संगम है।

आकृतियों के माध्यम से दाम्पत्य सुख, भाई की रक्षा और घर की सुरक्षा की कामना की जाती है।

6. Famous Places of Saanjhi – प्रमुख स्थान

1. नाथद्वारा – केले की साँझी के लिए प्रसिद्ध।

2. उदयपुर – मछन्दरनाथ मंदिर को “संझया मंदिर” कहा जाता है।

3. जयपुर – लाड़ली जी मंदिर में प्रतिदिन आकर्षक साँझी बनाई जाती है।

4. वृंदावन – साँझी की जन्मस्थली मानी जाती है।

7. Modern Relevance – आधुनिक समय में साँझी

आज भी राजस्थान और उत्तर भारत में साँझी कला धार्मिक, सांस्कृतिक और कलात्मक दृष्टि से जीवित है।

कई आर्ट स्कूल्स और कलाकार अब इसे आधुनिक माध्यमों (canvas, paper, fabric) पर भी प्रदर्शित करते हैं।

सारांश (Summary)

साँझी कला भारत की पारंपरिक लोककला है जिसकी उत्पत्ति भगवान श्रीकृष्ण की लीलाओं से जुड़ी है। यह कला धार्मिक आस्था, स्त्री-संवेदना और सांस्कृतिक परंपराओं का सुंदर संगम है। राजस्थान में विशेष रूप से यह परंपरा पितृपक्ष के समय जीवंत रूप में देखी जाती है, जब कुमारी कन्याएँ दीवारों पर गोबर, आटा, हल्दी और कौड़ियों से विविध आकृतियाँ बनाकर देवी की आराधना करती हैं। नाथद्वारा, उदयपुर, जयपुर और वृंदावन इस कला के प्रमुख केंद्र हैं। साँझी के माध्यम से लोकजीवन में परिवार की मंगलकामना, भाई की दीर्घायु और घर की समृद्धि की प्रार्थना की जाती है। आधुनिक समय में यह कला न केवल धार्मिक दृष्टि से बल्कि सांस्कृतिक पहचान के रूप में भी उभर रही है। यही कारण है कि साँझी आज भी भारतीय लोकसंस्कृति का अभिन्न हिस्सा बनी हुई है।

Facts Table (तथ्य तालिका):

तथ्य 

 विवरण

उत्पत्ति स्थान वृंदावन
प्रमुख समय पितृपक्ष
प्रमुख सामग्री गोबर, आटा, हल्दी, कौड़ियाँ
प्रसिद्ध स्थान  नाथद्वारा, जयपुर, उदयपुर
बड़ी साँझी  संझया कोट

FAQs (अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न):

Q1. साँझी क्या है?

साँझी एक पारंपरिक लोककला है जो दीवार पर धार्मिक आकृतियों के रूप में बनाई जाती है।

Q2. साँझी कला की शुरुआत कहाँ से हुई?

इसकी शुरुआत वृंदावन में भगवान श्रीकृष्ण द्वारा हुई मानी जाती है।

Q3. साँझी कब बनाई जाती है?

पितृपक्ष के दौरान प्रतिदिन अलग-अलग रूप में बनाई जाती है।

Q4. साँझी में कौन-सी वस्तुएँ प्रयोग होती हैं?

गोबर, आटा, हल्दी, कुमकुम, कौड़ियाँ और फूल-पत्तियाँ।

Q5. बड़ी साँझी को क्या कहा जाता है?

संझया कोट।

Q6. नाथद्वारा की साँझी किससे बनती है?

केले के पत्तों से।

Q7. साँझी बनाने का उद्देश्य क्या है?

देवी की आराधना और परिवार की मंगलकामना।

Q8. साँझी किनके द्वारा बनाई जाती है?

कुमारी कन्याओं द्वारा।

Q9. उदयपुर का कौन-सा मंदिर साँझी के लिए प्रसिद्ध है?

मछन्दरनाथ मंदिर।

Q10. जयपुर में कहाँ साँझी बनाई जाती है?

लाड़ली जी मंदिर में।\

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