Lachhura Bhilwara लाछूरा भीलवाड़ा पुरास्थल राजस्थान का एक महत्वपूर्ण उत्खनन स्थल है, जहाँ 700 BC से 200 AD तक की सांस्कृतिक परतें मिलीं। इस स्थल से मानव व पशु मूर्तियाँ, ताम्र चूड़ियाँ और ब्राह्मी लिपि की मुहरें प्राप्त हुईं।
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Toggle1. परिचय (Introduction – लाछूरा भीलवाड़ा परिचय)
स्थान: लाछूरा, जिला भीलवाड़ा, राजस्थान।
पुरास्थल का महत्व: राजस्थान की प्राचीन सभ्यता की निरंतरता को दर्शाने वाला महत्वपूर्ण स्थल।
काल सीमा: लगभग 700 ई.पू. से 200 ई. तक का कालखंड।
संस्कृति विभाजन: चार कालों में विभाजित –
1. पूर्व NBP (Pre-NBP)
2. NBP (Northern Black Polished Ware)
3. शुंग काल
4. कुषाण काल
2. उत्खनन का इतिहास (Excavation History – उत्खनन का विवरण)
1. उत्खनन वर्ष: 1998–99
2. मुख्य निदेशक: बी. आर. मीना
3. सह-कार्यकर्ता: एस. सी. सरन, कंवर सिंह और बी. आर. सिंह
4. उद्देश्य: लाछूरा क्षेत्र की सांस्कृतिक परतों और मानव बसावट का अध्ययन।
5. परिणाम: चार सांस्कृतिक कालों की परतें और विविध पुरा सामग्री प्राप्त हुई।
3. सांस्कृतिक काल और सामग्री (Cultural Phases and Findings – सांस्कृतिक विकास)
1. पूर्व NBP काल: प्रारंभिक ग्रामीण जीवन और मिट्टी के बर्तनों का प्रयोग।
2. NBP काल: लोहे के औजारों और धातु उपयोग में वृद्धि।
3. शुंग काल: धार्मिक प्रतीक, मूर्तिकला का विकास।
4. कुषाण काल: कला, धर्म और व्यापार का उत्कर्ष काल।
4. प्रमुख पुरा सामग्री (Major Antiquities – मुख्य अवशेष)
मानव एवं पशुओं की मृण्यमूर्तियाँ (Terracotta figurines)
लोहे का चाकू (Iron knife)
तांबे की चूड़ियाँ (Copper bangles)
मिट्टी की मुहरें (Clay seals) – जिन पर ब्राह्मी लिपि के चार अक्षर अंकित।
ललितासन मुद्रा में नारी मूर्ति (Seated female figurine) – शुंग या कुषाण काल की विशेषता।
5. पुरास्थल का ऐतिहासिक महत्व (Historical Significance – महत्व)
1. लाछूरा का उत्खनन राजस्थान की प्रागैतिहासिक से ऐतिहासिक संस्कृति के संक्रमण को स्पष्ट करता है।
2. यहाँ से मिली ब्राह्मी लिपि की मुहरें प्रारंभिक लेखन प्रणाली के प्रमाण देती हैं।
3. धातु उपयोग, कला और मूर्तिकला के विकास का यह केंद्र रहा।
4. सांस्कृतिक निरंतरता (Cultural Continuity) को प्रदर्शित करने वाला प्रमुख स्थल।
सारांश (Summary विश्लेषणात्मक विवरण)
लाछूरा, भीलवाड़ा का यह पुरास्थल राजस्थान की ऐतिहासिक धरोहरों में एक अत्यंत महत्वपूर्ण केंद्र है। 1998–99 में बी. आर. मीना के निर्देशन में किए गए उत्खनन ने यह सिद्ध किया कि यहाँ मानव बसावट लगभग 700 ईसा पूर्व से ही प्रारंभ हो चुकी थी और यह क्षेत्र कुषाण काल (200 ई.) तक आबाद रहा। यहाँ से प्राप्त मृण्यमूर्तियाँ, मिट्टी की मुहरें, लोहे के औजार और तांबे की चूड़ियाँ स्पष्ट करती हैं कि यह क्षेत्र उस समय सांस्कृतिक और औद्योगिक रूप से विकसित समाज का हिस्सा था। विशेष रूप से ब्राह्मी लिपि की मुहरें इस बात का प्रमाण हैं कि यहाँ लेखन और व्यापार की परंपरा प्रचलित थी। यह स्थल राजस्थान के प्राचीन इतिहास, शिल्पकला, और सामाजिक जीवन की समझ को नया आयाम देता है।
Facts Table (तथ्य तालिका)
तथ्य |
विवरण |
| उत्खनन वर्ष | 1998–99 |
| उत्खननकर्ता | बी.आर. मीना, एस.सी. सरन, कंवर सिंह, बी.आर. सिंह |
| काल सीमा | 700 ई.पू. – 200 ई. |
| प्रमुख अवशेष | मृण्यमूर्तियाँ, मिट्टी की मुहरें, तांबे की चूड़ियाँ |
| लिपि | ब्राह्मी लिपि के चार अक्षर अंकित |
FAQs (अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न)
1. लाछूरा पुरास्थल कहाँ स्थित है?
यह राजस्थान के भीलवाड़ा जिले में स्थित है।
2. लाछूरा में उत्खनन कब हुआ था?
वर्ष 1998–99 में।
3. लाछूरा का उत्खनन किसने किया था?
बी.आर. मीना के निर्देशन में एस.सी. सरन, कंवर सिंह और बी.आर. सिंह ने।
4. यह स्थल किस काल से संबंधित है?
700 ई.पू. से 200 ई. तक के काल से।
5. यहाँ कौन-कौन सी मूर्तियाँ मिलीं?
मानव और पशुओं की मृण्यमूर्तियाँ।
6. यहाँ से कौन-सी लिपि मिली?
ब्राह्मी लिपि की मुहरें प्राप्त हुईं।
7. कौन से धातु के अवशेष मिले?
तांबे की चूड़ियाँ और लोहे का चाकू।
8. लाछूरा का ऐतिहासिक महत्व क्या है?
यह स्थल राजस्थान के सांस्कृतिक और औद्योगिक विकास का प्रमाण है।
9. ललितासन मुद्रा में नारी मूर्ति किस काल की है?
शुंग या कुषाण काल की मानी जाती है।
10. NBP का अर्थ क्या है?
Northern Black Polished Ware — उत्तरी काले पालिशदार मिट्टी के बर्तन।
