Dilwara Jain Temples, माउंट आबू (राजस्थान) के विश्वप्रसिद्ध जैन मंदिर हैं। इनमें विमलवसही (आदिनाथ) और लूणवसही (नेमिनाथ) मंदिर अपनी सूक्ष्म नक्काशी और स्थापत्य कला के लिए जाने जाते हैं। यहाँ पाँच मंदिरों का समूह है जो भारत की शिल्पकला की पराकाष्ठा को दर्शाते हैं।
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Toggleपरिचय / Introduction
दिलवाड़ा के जैन मंदिर, माउंट आबू (राजस्थान) के आबू देलवाड़ा गाँव में स्थित पाँच मंदिरों का समूह हैं। ये मंदिर अपनी अद्वितीय श्वेत संगमरमर की नक्काशी, सूक्ष्म शिल्पकला और स्थापत्य की उत्कृष्टता के लिए विश्वभर में प्रसिद्ध हैं।
विद्वान फर्ग्यूसन, हेवेल और स्मिथ तक ने कहा है कि कारीगरी और सूक्ष्मता की दृष्टि से भारत में इन मंदिरों की समता कोई इमारत नहीं कर सकती।
दिलवाड़ा मंदिर समूह / The Dilwara Temple Complex
दिलवाड़ा में पाँच प्रमुख जैन मंदिर हैं —
1. विमलवसही (आदिनाथ) मंदिर
2. लूणवसही (नेमिनाथ) मंदिर
3. कुंथुनाथ दिगंबर जैन मंदिर
4. पित्तलहर या भीमाशाह का मंदिर
5. खरतरवसही पार्श्वनाथ एवं महावीर स्वामी मंदिर
1. विमलवसही (आदिनाथ) मंदिर
निर्माण : 1031 ईस्वी
निर्माता : चालुक्य महाराजा भीमदेव के मंत्री व सेनापति विमलशाह
शिल्पकार : कीर्तिधर
देवता : प्रथम तीर्थंकर भगवान ऋषभदेव (आदिनाथ)
यह मंदिर दिलवाड़ा समूह का सबसे प्राचीन और उत्कृष्ट मंदिर है। गर्भगृह, सभा-मंडप और स्तंभों की नक्काशी में ऐसी सूक्ष्मता है कि संगमरमर पत्थर को जीवंत रूप मिलता है।
2. लूणवसही (नेमिनाथ) मंदिर
निर्माण : 1230 ईस्वी
निर्माता : राजा भीमदेव के अमात्य वास्तुपाल व तेजपाल
शिल्पी : शोभनदेव
देवता : 22वें तीर्थंकर भगवान नेमिनाथ
प्रतिष्ठा : संवत् 1287 में आचार्य श्री विजयसेन सूरि द्वारा
विशेषताएँ :
सभा-मंडप और जिनालय
हस्तिशाला (हाथियों की मूर्तियाँ)
‘देवरानी-जेठानी के गवाक्ष’ नामक शिल्प
3. कुंथुनाथ दिगंबर जैन मंदिर
निर्माण : 1449 ईस्वी
निर्माता : महाराणा कुंभा
देवता : भगवान कुंथुनाथ
4. पित्तलहर (भीमाशाह) मंदिर
देवता : भगवान आदिनाथ
विशेषता : यहाँ भगवान आदिनाथ की मूर्ति 108 मन पीतल से बनी है।
इसी कारण इसे “पित्तलहर मंदिर” कहा जाता है।
5. खरतरवसही मंदिर
देवता : भगवान पार्श्वनाथ एवं भगवान महावीर स्वामी
स्थापत्य और धार्मिक दृष्टि से यह भी अत्यंत महत्त्वपूर्ण है।
स्थापत्य कला की विशेषताएँ / Architectural Features
श्वेत संगमरमर का प्रयोग
गर्भगृह, सभा-मंडप और स्तंभों की सूक्ष्म नक्काशी
छतों और मण्डपों की अद्वितीय शिल्पकला
हस्तिशाला में हाथियों की मूर्तियाँ
गवाक्ष, देवक्लिकाएँ और उत्कृष्ट शिल्प कौशल
सारांश / Summary
दिलवाड़ा जैन मंदिर न केवल जैन धर्म के तीर्थस्थल हैं, बल्कि भारतीय स्थापत्य और शिल्पकला की सर्वोच्च उपलब्धि भी हैं। संगमरमर की अद्भुत नक्काशी, सूक्ष्म कलाकारी और धार्मिक आस्था इन मंदिरों को विश्व में अद्वितीय बनाती है।
Table : दिलवाड़ा के पाँचों मंदिर
क्रम |
मंदिर का नाम |
देवता |
निर्माण वर्ष |
निर्माता |
| 1 | विमलवसही (आदिनाथ) | भगवान ऋषभदेव (आदिनाथ) | 1031 ई. | विमलशाह द्वारा |
| 2 | लूणवसही (नेमिनाथ) | भगवान नेमिनाथ | 1230 ई., | वास्तुपाल-तेजपाल द्वारा |
| 3 | कुंथुनाथ दिगंबर जैन मंदिर | भगवान कुंथुनाथ | 1449 ई | महाराणा कुंभा द्वारा |
| 4 | पित्तलहर (भीमाशाह) मंदिर | भगवान आदिनाथ | ||
| 5 | खरतरवसही मंदिर | भगवान पार्श्वनाथ व महावीर स्वामी | अज्ञात | |
FAQ (अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न)
Q1. दिलवाड़ा जैन मंदिर कहाँ स्थित हैं?
→ माउंट आबू, राजस्थान के आबू देलवाड़ा गाँव में।
Q2. दिलवाड़ा के जैन मंदिर कितने हैं?
→ कुल पाँच मंदिर – विमलवसही, लूणवसही, कुंथुनाथ, पित्तलहर और खरतरवसही।
Q3. सबसे प्राचीन दिलवाड़ा मंदिर कौन-सा है?
→ विमलवसही (आदिनाथ) मंदिर, 1031 ईस्वी में निर्मित।
Q4. लूणवसही मंदिर किस तीर्थंकर को समर्पित है?
→ भगवान नेमिनाथ (22वें जैन तीर्थंकर)।
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